
: सप्तधृतमातृका पूजनं:
सप्तघृत मातृका पूजा केल्याने सर्व देवता शक्तीचे कृपा आशीर्वाद मुळे निर्विघनने कार्य संपन्न होण्या साठी सप्तघृत पूजा करतात
ॐ वसो : पवित्र शतधारं वसो : पवित्रमसि सहस्त्र धारण् । देवस्त्वा सविता पुनातु वसो : पवित्रेण शतधारेण सुप्वा : काम धुक्ष्व : ॥
तत्पश्चात् सातों बिन्दुओं को गुढ घी से एकीकृत करें कुकुंमादि से अलंकार करें । साथ ही हाथ में अक्षत लेकर एक – एक देवी की प्रतिष्ठा करें ।
श्री
ॐ मनस : काममाकूति वाच : सत्यमसीमहि पशूना र्ठ रूपमन्नस्य रसोयश : श्री श्रंयतां मयि स्वाहा ॥१॥
ॐ भू र्भुव : स्व : श्रियै नमः श्रियम् आवाह्यामि स्थापयामि ।
लक्ष्मी
ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्चपत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम । इष्णन्निषाणा मुम्मऽइषाण सर्वलोकम्मऽइषाण ।
ॐ भू र्भुव : स्व : लक्ष्म्यै नमः । लक्ष्मीम् आवाह्यामि स्थापयामि ।
धृति
ॐ भद्रंकर्णेभि : श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा : । स्थिरै रंगैस्तुष्टुवा र्ठ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायु : ॥
ॐ भू र्भुव : स्व : धृत्यै नमः । घृतिमावाह्यामि स्थापयामि ।
मेधा
ॐ मेधाम्मे वरुणो ददातु मेधामग्नि : प्रजापति । मेधा मिन्द्रश्च वायुश्च मेधान्धाता ददातु में स्वाहा ॥
ॐ भू र्भुव : स्व : मेधायै नमः । मेधाम् आवाहयामि स्थापयामि ।
स्वाहा
ॐ प्राणाय स्वाहा : ऽपानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा : । चक्षुसे स्वाहा : श्रोत्राय स्वाहा : वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा : ॥
ॐ भू र्भुव : स्व : स्वाहायै नमः । स्वाहामावाह्यामि स्थापयामि ।
प्रज्ञा
ॐ आयंगौ पृश्निर क्रमीद् सदन्मातरम्पुर : ॥ पितरंचप्रयन्त्स्वः ॥ ॐ भू र्भुव : स्व : प्रज्ञायै नमः आवाहयामि स्थापयामि ।
सरस्वती
ॐ पावकान : सरस्वतीवाजेभि र्वाजनीवति । यज्ञवष्टु – धियावसु ॥ ॐ भू र्भुव : स्व : सरस्वत्यै नमः सरस्वती मावाह्यामि स्थापयामि ।



